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भूखंड के ढलाव से संबंधित वास्तु दिशा-निर्देश

भूखंड के ढलाव से संबंधित वास्तु दिशा-निर्देश

भूखंड का चयन करने में भूमि का ढलाव भी महत्वपूर्ण होता है। उपरोक्त दिशा-निर्देशों के साथ-साथ भूखंड की सतह के ढलाव का भी परीक्षण करना चाहिए। कैसा ढलाव आदर्द्गा होता है, इसी का वर्णन हम यहां कर रहे हैं।

ढलाव परीक्षण के लिए भूखंड को मूलतः दो भागों में बांटा जाता है। उत्तर-पूर्व भाग को सूर्य का क्षेत्र तथा दक्षिण-पश्चिमी भाग को चंद्रमा का क्षेत्र माना जाता है। आदर्द्गा भूखंड में ढलाव दक्षिण-पश्चिम  से उत्तर-पूर्व की ओर होता है यानी की चंद्रमा का क्षेत्र सूर्य के क्षेत्र की तुलना में ऊंचा होना चाहिए।

इसको अधिक विस्तार से ऐसे समझा जा सकता हैः-

उत्तर-पूर्व कोना भूखंड में सबसे ढलाव पर यानी सबसे नीचा होना चाहिए।

उत्तर-पश्चिम को उत्तर-पूर्व की तुलना में थोड ा ऊंचा होना चाहिए।

दक्षिण-पूर्व भाग उत्तर-पूर्व से ऊंचा हो।

इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिम को दक्षिण-पूर्व से अधिक ऊंचा होना चाहिए।

मतलब यह कि भूखंड का उत्तर-पूर्व कोने का स्तर सबसे निम्नतम, जबकि दक्षिण-पश्चिम का सर्वाधिक ऊंचा होना चाहिए। उत्तर-पूर्वी कोने का न्यूनतम होना इस कोण पर पड़ने वाली सुबह के सूरज की किरणों से घर में प्रकाश व ऊर्जा का संचार बनाए रखता है। इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिमी कोना दोपहर के सूरज की अल्ट्रा रेड किरणों से घर को गर्म होने से बचाता है।

जिस भूखंड का केंद्र शेष धरातल से उभरा हुआ हो अथवा केंद्र में गड्‌ढा हो, ऐसा भूखंड भी उत्तम नहीं माना जाता। ऐसे भूखंड के धरातल को समानांतर करवाने में खासी धनराशि व्यय करनी पड ती है। केंद्र उभरा होने से इस बात की आशंका भी रहती है कि भूखंड का गर्भ पत्थरीला हो। अगर ऐसा होता है तो उसके गर्भ को विस्फोट के माध्यम से सामान्य करना पडेगा। इसके लिए भी भू-स्वामी को अतिरिक्त व्यय करना होगा।

भूखंड का स्तर सड क के लैवल से ऊंचा होना चाहिए। भवन व सड क के बीच जल की निकासी के लिए नाली बनायी जाती है। अगर अत्यधिक वर्षा के कारण नाली का पानी अगर बाहर निकलने लगे तो वह मकान में प्रवेद्गा न करके बाहर सडक पर निकल जाए। इसके साथ ही भवन में जो अतिरिक्त पानी हो वह भी आसानी से बाहर निकल सके।

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