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भूखंड के लिए सर्वोत्तम दिशा कौन सी है?

दिशा निर्धारण क्यों?

प्राचीन धर्म-ग्रन्थों में सूर्य को जीवनदायक बताया गया है। यह भी वर्णित किया गया है कि भवन निर्माण के दौरान सूर्य की स्थिति को विद्गोद्गा महत्व दिया जाता है। भवन का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि वहां निवास करने वाले सदस्य सुबह के सूरज की पैरा-बैंगनी किरणों से लाभान्वित हो सकें। ये किरणें हमें विटामिन-डी प्रदान करती हैं। वहीं दोपहर के सूरज की अल्ट्रा-रेड किरणों से बचाव हो सके। इसी आधार पर घर के पूर्वी (जहां सुबह के सूरज का प्रकाद्गा पड़ता है) एवं उत्तरी भाग (जहां सूर्य का प्रकाद्गा लगातार और लम्बी अवधि तक रहता है) में ऐसे कक्षों का निर्माण किया जाता हैजहां परिवार के सदस्य अपना दिनभर का अधिकांश समय व्यतीत करते हैंजबकि दक्षिण व पश्चिम भाग में रात्रि विश्राम के लिए शयन कक्ष आदी का निर्माण किया जाता है।

इस प्रकार किसी भी भवन का ले-आउट या वास्तु सूर्य की स्थिति पर निर्भर करता है। प्रत्येक भूखंड का ले-आउट भिन्न होता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उक्त भूखंड का मुख किस दिशा की ओर है।

भूखंड के लिए सर्वोत्तम दिशा कौन सी है?

प्राचीन वास्तुशास्त्रों में वर्णित दिशा-निर्देशों के अनुसार भूखंड के लिए आदर्श दिशा का निर्धारण सामान्य बुद्धितर्क और विज्ञान पर आधारित होता है। वास्तु के अनुसारप्रत्येक दिशा उत्तम होती है और प्रत्येक दिशा का अपना महत्व है। जहां तक बात है अंतर कीतो गांवों या कस्बों की तुलना में द्गाहरों एवं महानगरों में भूखंडों की स्थिति में मुखय अंतर यह होता है कि यहां सभी चारों दिशाओं  में मार्ग/सड़कें होती हैंजिनके दोनों ओर भवन निर्मित होते हैं। वास्तव में यही वास्तु-विन्यास द्गाहर को खूबसूरत भी बनाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वास्तु के अनुसारप्रत्येक दिशा  महत्वपूर्ण है। जरूरत हमें उस दिशा विशेष के महत्व को जानने और तदनुरूप उसका उपयोग करने की है।

पूर्वोन्मुखी भूखंड बुद्धिजीवियों अर्थात लेखकशिक्षकछात्र/छात्रादार्शनिकपादरी या प्रफेसर आदी के लिए उत्तम होती है। चूंकि इस दिद्गाा से सूर्य उदय होता हैइसलिए यह दिशा जागरूकता की ज्ञान-प्रकाश की दिशाएं होती है। उत्तर दिद्गाा मुखी भूखंड उच्च पदों पर आसीन अधिकारियोंव्यवस्थापकों और सरकारी मुलाजिमों के लिए बेहतर होते हैं। वहीं दक्षिण-मुखी प्लॉट व्यवसायियों के लिए अथवा व्यावसायिक संस्थानों में प्रबंधन आदी का भार संभालने वाले उच्च अधिकारियों के लिए अच्छे होते हैं। जबकि पश्चिमोन्मुखी प्लॉट समाज सेवा या इससे संबंधित कार्य करने वाले लोगों के लिए उत्तम होते हैं।

प्रत्येक दिशा समाज के एक अलग तबके के लिए उत्तम बतायी गयी है। प्राचीन काल में भी समाज चार मूल वर्गों में विभक्त था। ये वर्ग आरंभ में व्यवसाय पर आधारित थेजिन्होंने कालांतर में जाति का रूप ले लिया। जातिगत अंतर समय के साथ इतने गहरे होते चले गए कि प्रत्येक जाति के लोग अपने ही समूह में रहना पसंद करने लगे। यही वजह रही कि उनके आवास आसपास स्थित होते थे।

अगर किसी भूखंड का मुख मूल दिद्गााओं में से किसी भी एक दिद्गाा की ओर नहीं हैतो इसका तात्पर्य है कि उक्त भूखंड का केंद्र बिंदू पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के केंद्र बिंदू के समकक्ष नहीं है। ऐसे भूखंड पर निर्मित किए जाने वाले भवन का मुख मूल दिशाओं के समागम कोण से बनने वाली अन्य चार दिशाओं (आग्नेयनैऋत्यवायव्यईशान) की ओर किया जा सकता है।

मिट्‌टी की गुणवत्ता से करें भूखंड के द्गाुभ-अद्गाुभ का निर्णय

प्राचीन वास्तुशास्त्रों में मिट्‌टी को किसी भी भूखंड की अनुकूलता व प्रतिकूलता जानने के लिए अहम्‌ अवयव बताया गया है। यानी कि मिट्‌टी की जांच से आप जान सकते हैं कि उक्त भूखंड भवन निर्माण के उद्‌देद्गय से कैसा रहेगा। जैसा कि हमने पहले भी लिखा हैवास्तु का वैज्ञानिक आधार है। इसलिए यहां जो भी दिशा-निर्देश दिए जा रहे हैंवे पूर्णतः तार्किक हैं।

निर्माण चाहे आवास के उद्‌देद्गय से करना हो या व्यवसाय के लिएसबसे पहली आवद्गयकता भूमि की होती है। भूमि के चयन से पहले जान लेना चाहिए कि उक्त भूमि/भूखंड का इस्तेमाल पूर्व में किस उद्‌देश्य के लिए किया जाता रहा है।

जिस भूखंड की मिट्‌टी उपजाऊ हो अर्थात जो कृद्गिा कार्यों के अनुकूल होवह भूमि निर्माण के लिए सर्वोत्तम होती है। मिट्‌टी की पहचान आप उसके रंग के माध्यम से भी कर सकते हैं। मिट्‌टी विविध रंगों की होती हैजैसे- लालगहरे भूरे रंग कीसफेदलालईंट के समान लाल रंग कीकाली और पीली। लालगहरी लालभूरी व पीली मिट्‌टी निर्माण के लिए उपयुक्त मानी जाती है। वहीं काली मिट्‌टी तथा नमी वाली मिट्‌टी निर्माण के लिए उत्तम नहीं होती। ऐसी मिट्‌टी में पानी की नमी बनी रहती हैजिससे भवन की नींव धंसने/बैठने की आशंका बनी रहती है। ऐसी भूमि को खरीदने से बचना चाहिए।

पत्थरीली या झाड़ीदार पौधों वाली भूमि भी निर्माण के लिए अनुकूल नहीं होती। भूमि के पत्थरीली होने का तात्पर्य यह है कि उक्त भूखंड के गर्भ में पत्थरीला यानी कठोर है। ऐसी भूमि को निर्माण के अनुकूल बनाने हेतु विस्फोट का सहारा लेना पड ता हैजो भू-स्वामी पर अतिरिक्त खर्च बढ ाता है।

ऐसी मिट्‌टी जिसमें कीडे या केचुएं आदी अधिक मात्रा में होवह भी निर्माण के अनुकूल नहीं मानी जाती। ऐसी भूमि में डाली गयी नींव मजबूत नहीं रहती।



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