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वास्तु एवं धर्म- मंदिर भी होते हैं वास्तु सम्मत

वास्तु एवं धर्म- मंदिर भी होते हैं वास्तु सम्मत

भारत की सांस्कृतिक विरासत और अध्यात्म इसकी सबसे बड़ी पहचान है। जिन लोगों की यह धारणा है कि वास्तु केवल भवनों एवं व्यवसायिक स्थलों के लिए महत्वपूर्ण होता हैवे गलत सोचते हैं। वास्तु धार्मिक स्थलों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला से हमें इस बात के अनेक प्रमाण मिल सकते हैं। मंदिर का वास्तु वहां प्रतिमा के रूप में विराजमान देवी/देवतावहां लगाए गए पेड -पौधोंदीवारों के रंगों और स्थान के आकार के बीच संतुलन दर्शाता है।

मंदिर का निर्माण करना धार्मिक एवं पवित्र कार्य है। मंदिर में कुछ मूल अवयव होते हैंजैसे- गर्भगृहप्रदक्षिणा मार्गबुर्ज अथवा शिखर और सभामंडप एवं अंतराल आदी। गर्भगृह वह होता हैजहां मंदिर के प्रमुख देवता की प्रतिद्गठा की जाती है। अपने आराध्य देव की प्रतिमा के गिर्द बने जिस स्थान पर भक्तगण परिक्रमा लगाते हैंउसे प्रदक्षिणा पथ कहा जाता है।

गर्भगृह के ऊपर जो मीनार या बुर्ज होता हैउसे हम शिखर अथवा गोपुरम कहते हैं। अमूमन गर्भगृह एक आयातकार कक्ष में खुलते हैंइस कक्ष को अन्तराल कहा जाता है। मंडप में आने के लिए एक अर्धमंडप अथवा द्वारमंडप होता है। वहीं मंडप स्तंभों पर निर्मित एक सभाभवन होता है।  

मंदिर वास्तुशिल्‍प उसके अंगों के अनुसार तीन प्रकार का होता है- नगर,  द्रविड और वेसर। हिंदू परम्परा के अनुसारमंदिर मानव शरीर के अनुरूप होता है। मंदिर का शीष भाग सिर,गर्भगृह उसकी ग्रीवासामने का मंदिर उदरप्रदक्षिणा पथ की दीवारें टांगें और गोपुर चरण होते हैं। देवता या भगवान की प्रतिमा मंदिर रूपी शरीर की आत्मा यानी जीव है।

मंदिर निर्माण हेतु दिशा-निर्देश

ह्ण     मंदिर या धर्मस्थल का निर्माण करने के लिए सबसे पहले जरूरत है सही निर्माण स्थल का चयन करने की।

ह्ण     वर्गाकार अथवा आयताकार प्लॉट मंदिर/धर्मस्थल के निर्माण के लिए उपयुक्त माना जाता है। मंदिर की चारदीवारी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के समकक्ष होनी चाहिए।

ह्ण     मंदिर परिसर के फर्श की ढलान दक्षिण से उत्तर की ओर तथा पश्चिम से पूर्व की तरफ होनी चाहिए। दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की तरफ फर्द्गा की ढलान सर्वोत्तम होती है। मंदिर परिसर के पूर्व अथवा उत्तर दिशा में अगर समुद्र या नदी है तो परिसर में उत्तर-पूर्व की ओर ढलान प्राकृतिक रूप से होती है।

ह्ण     पादरी या पंडित के रहने का स्थान मंदिर परिसर से बाहर होना चाहिए।

ह्ण     जिस मंच पर देवी/देवताओं की प्रतिमा/प्रतिमांए प्रतिद्गिठत होंउसे पश्चिम दिशा में होना चाहिएजिससे प्रतिमाओं का मुख पूर्व दिशा की ओर हो। अंतराल अथवा सभामंडप की छत की ऊंचाई मुखय मंदिर यानी गर्भगृह की ऊंचाई से कम होनी चाहिए।

ह्ण     फव्ववारे या अन्य किसी प्रकार के जल प्रासाधन मंदिर परिसर के उत्तर-पूर्व में हों।

ह्ण     म्ंदिर भवन में प्रवेश करने से पूर्व हाथ-मुंह स्वच्छ करने का स्थान पूर्व में बनाना चाहिए। जबकि शौचालय का निर्माण मंदिर परिसर से बाहर किया जाए।

ह्ण     दीपस्तंभहवनकुंड या अग्निकुंड को मंदिर परिसर में दक्षिण-पूर्व भाग में होना चाहिए।

ह्ण     मंदिर में प्रवेश करने के लिए बने मुखय द्वार की ऊंचाई मंदिर में बने अन्य द्वारों से अधिक हो।

ह्ण     देव प्रतिमांए मंदिर परिसर के मुखय द्वार से दिखाई नहीं देनी चाहिए।

ह्ण     मंदिर के स्तंभों एवं फर्द्गा का रंग सफेदपीला या हल्का केसरिया होना चाहिए।

ह्ण     मंदिर के पूर्वी भाग में इस प्रकार की व्यवस्था हो कि सुबह ६ बजे से ९ बजे के बीच सूर्य की किरणें देव प्रतिमाओं को प्रकाशमान करें।

ह्ण     मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं हो सकती है। लेकिन इनमें से हनुमान जी की प्रतिमा दक्षिण-मुखी हो सकती है। अन्य देवी/देवताओं की प्रतिमा का मुख दक्षिण की ओर नहीं होना चाहिए।

ह्ण     मंदिर के चारों ओर पर्याप्त मात्रा में खुला स्थान होना चाहिए।

ह्ण     श्रद्धालुओं द्वारा गर्भगृह में परिक्रमा करने के लिए प्रदक्षिणा पथ की व्यवस्था होनी चाहिए।

ह्ण     वास्तुशास्त्रानुसारमंदिर भवन की परछाई किसी अन्य इमारत पर नहीं पड़नी चाहिए। ऐसा तभी संभव हैजब मंदिर किसी ऊंची पहाडी परएकांत स्थल में बना होजहां जनसंखया घनत्व कम हो।

ह्ण     मंदिर परिसर में अगर उत्सव इत्यादी का आयोजन करना हो तो उन्हें मंदिर प्रांगण के पश्चिम या दक्षिण भाग में आयोजित कर सकते हैं।

ह्ण     मंदिर परिसर में पेड-पौधे लगाने के लिए पर्यावरण संबंधी वास्तु नियमों का अनुपालन करना चाहिए।

ह्ण     दान/चंदा पेटी को उत्तर या पूर्व दिशा में रखें।

ह्ण     घंटी मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगाएं।

ह्ण     मंदिर परिसर में बने स्तंभ वर्गाकारआयताकार अथवा गोलाकार हों।

ह्ण     वहनों के लिए पार्किंग स्थल मंदिर के बाहर पूर्व अथवा उत्तर में बनाएं।

ह्ण     मंदिर परिसर के चारों ओर सडक/मार्ग होना अतिशुभ होता है। ऐसा मंदिर विशेष खयाति प्राप्त करता है।

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