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परिचय

१३ अगस्त, १९६७। एक सामान्य तारीख। यूं भी तारीख कोई भी हो, वह विशेष नहीं होती। उसे विशेष बनाती है वो हस्तियां/घटनाएं, जो इनके साथ जुड़ जाती हैं। वास्तु विशेषज्ञ- नरेश सिंगल का जन्म भी इसी तारीख यानी १३ अगस्त, १९६७ को हुआ था, जिसने इस तारीख को विशेष बना दिया। विशेष इसलिए कि वास्तु जैसे पुरातन विषय को आधुनिक पहचान देने में नरेश सिंगल का नाम अग्रणीय है। बात भारत की हो या किसी अन्य देश की, वास्तु पर सेमीनार एवं कार्यशाला आयोजित कर लोगों को जागरूक करने और उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का जो कार्य नरेश सिंगल ने किया है,  वो किसी अन्य ने नहीं। यही वजह है कि आज इनका नाम वास्तु और फेंग्शुई जैसे विषयों  का पर्यायवाची स्वरूप बन गया है।

ग्रेजुएशन एवं इंटीरियर डिजाइनिंग की पढाई करने के बाद नरेश सिंगल ने वास्तु, फेंग्शुई और पिरामिडोलॉजी जैसे विषयों पर रिसर्च कार्य आरंभ किया। उन्होंने न सिर्फ इस सत्य को आत्मसात किया, बल्कि स्थापित भी किया कि वास्तु, फेंग्शुई एवं पिरामिडोलॉजी मनगढंत नहीं, बल्कि तार्किक हैं, ये महज अनुमान नहीं, विज्ञान हैं। ऐसा विज्ञान, जिसकी जानकारी इंसान के जीवन में उसी तरह चमत्कारिक परिवर्तन ला सकती है, जिस तरह बिजली व इंटरनेट के आविश्‍कार।

नरेश सिंगल के लेख व साक्षात्कार अग्रणी समाचार-पत्र, पत्रिकाओं में चाव से पढे जाते हैं। विभिन्न  टेलीविजन चैनल भी समय-समय पर वास्तु, फेंग्शुई एवं पिरामिडोलॉजी पर उनकी राय लेते हैं। ‘वास्तु श्री’, ‘वास्तु विशारद  (गोल्ड मेडलिस्ट) और भी न जाने कितने अलंकर्न, कितनी उपाधियों से सुशोभित हैं श्री सिंगल। इंस्टीट्‌युट ऑफ वैदिक वास्तु विजन के संस्थापक भी हैं श्री सिंगल, जहां सैकडो छात्र-छात्राएं वास्तु, फेंग्शुई, पिरामिडोलॉजी की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

मानसिक तनाव और वास्तु

चिंता चिता समान है। सच है। इससे भी बड़ा सच यह है कि वर्तमान परिवेश में अधिकांश लोग चिंता से ग्रस्त है। वे चाहे जिम्मेदार व्यस्क हों या युवा पीढी। ग्लोबलाइजेशन और पाश्‍चात्य संस्कृति के अनुसरण ने हमें सुविधाएं तो दी हैं, मानसिक तनाव भी दिया है। तनाव मिटाने के लिए अक्सर हम जिन रास्तों का चयन करते हैं, वे अस्थायी सुकुन तो देते हैं, लेकिन स्थायी शांती नहीं।

 

मानसिक तनाव की वजह वास्तु दोश भी हो सकता है?

 

जानते हैं, वास्तु क्या कहता है इस बारे में:-

 

सारी सुख-सुविधाएं और आराम के साधन होने के बावजूद आपका घर आपके तनाव की वजह बन सकता है, अगर वह वास्तु-सम्मत नहीं है। व्यक्ति साधन और सुविधाएं जुटाता है मानसिक शांती ने के लिए। इन सबके बावजूद उसे मानसिक शांती नहीं मिलती, तो इनका कोई औचित्य नहीं रह जाता। आपका घर आपको विश्रांति दे सके, इसके लिए जरूरी है आप उसे वास्तु के अनुकूल बनाएं।

 

वास्तु में सभी दसों दिशाओं का विशेष महत्व है। मगर उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम दिशाएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी गयी हैं। कुछ इसी तरह, जिस तरह हमारे शरीर के सभी अंग आवश्‍यक होने के बावजूद सिर/मस्तिष्‍क एवं पैरों को विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। चूंकि मस्तिष्‍क शरीर के सभी अंगों का संचालनकर्ता है, जबकि पांव मानव- शरीर का आधार हैं। ठीक ऐसे ही उत्तर-पूर्व दिशा किसी मकान में उसका मस्तिष्‍क है तो दक्षिण-पश्चिम पांव। इन दोनों ही स्थानों में यदि कोई वास्तु दोश है, तो उसका सीधा असर मकान के स्वामी अर्थात मुखिया एवं अन्य सदस्यों के मस्तिष्‍क पर पडता है। यह दोश उनके मानसिक तनाव का कारण बन जाता है।

 

मानसिक तनाव से बचना चाहते हैं तो निम्न तथ्यों पर ध्यान दें-

ह्ण    मकान का उत्तर-पूर्वी हिस्सा कटा हुआ नहीं होना चाहिए। यह आपकी उन्नति, पैसे की बढ़ोत्तरी को रोकता है, वहीं अनपेक्षित हानियों का कारण भी बनता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्वी कोना गोलाकार नहीं होना चाहिए।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में शौचालय का होना बीमारियों को आमंत्रित करता है।

ह्ण    अगर उत्तर-पूर्व में व्यस्कों या नवदंपती का बेडरूम बना है, तो यह उन्हें मानसिक व शारीरिक   रूप से अक्षम बना सकता है। यह दोश पौरुशहीनता या बांझपन की वजह भी बन जाता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में सीढियां होना आपकी आर्थिक व शारीरिक क्षति का कारण बनती हैं। यह दोश  आपको मोटे कर्ज में भी डूबो देता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में रसोईघर होने से आय कम खर्च अधिक की स्थिति बनती है तो मानसिक पीडा  भी झेलनी पडती है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व दिशा में आप पूजा का स्थान बना सकते हैं।

ह्ण    पूर्व में बच्चों के अध्ययन का कक्ष भी बनाया जा सकता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व को साफ-सुथरा, हवादार और प्रकाशयुक्त होना चाहिए। इससे आप दौलत और शौहरत    दोनों पा सकेंगे।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में आप हैंडपम्प लगा सकते हैं या अंडरग्राउंड वाटर टैंक बनवा सकते हैं। इस स्थान पर पीने का पानी, घड ा आदि रखना उपयुक्त है। अगर उत्तर-पूर्व से किसी भी रूप में बहता जल प्रवाहित हो रहा हो, तो यह अति द्गाुभ लक्षण है, जो आपको समृद्धि प्रदान करता है।

ह्ण    मकान का प्रवेद्गा द्वार उत्तर-पूर्व में होना शुभ फलदायक माना जाता है।

ह्ण    इस स्थान पर पौधे रखना, खासकर खिले हुए फूलों के पौधे या तुलसी का पौधा अति उत्तम है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व स्थान का बढा होना परिवार को वंश-वृद्धि एवं सुख-सुविधाएं देता है।

ह्ण    अगर इस स्थान पर बेसमेंट बनाया जाए तो वह सर्वाधिक उपयुक्त है।

ह्ण    मकान का उत्तर-पूर्वी हिस्सा कटा हुआ नहीं होना चाहिए। यह आपकी उन्नति, पैसे की बढ़ोत्तरी को रोकता है, वहीं अनपेक्षित हानियों का कारण भी बनता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्वी कोना गोलाकार नहीं होना चाहिए।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में शौचालय का होना बीमारियों को आमंत्रित करता है।

ह्ण    अगर उत्तर-पूर्व में व्यस्कों या नवदंपती का बेडरूम बना है, तो यह उन्हें मानसिक व शारीरिक  रूप से अक्षम बना सकता है। यह दोश पौरुद्गाहीनता या बांझपन की वजह भी बन जाता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में सीढि यां होना आपकी आर्थिक व द्गाारीरिक क्षति का कारण बनती हैं। यह दोद्गा आपको मोटे कर्ज में भी डूबो देता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में रसोईघर होने से आय कम खर्च अधिक की स्थिति बनती है तो मानसिक पीडा  भी झेलनी पडती है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व दिशा में आप पूजा का स्थान बना सकते हैं।

ह्ण    पूर्व में बच्चों के अध्ययन का कक्ष भी बनाया जा सकता है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व को साफ-सुथरा, हवादार और प्रकाशयुक्त होना चाहिए। इससे आप दौलत और शौहरत   दोनों पा सकेंगे।

ह्ण    उत्तर-पूर्व में आप हैंडपम्प लगा सकते हैं या अंडरग्राउंड वाटर टैंक बनवा सकते हैं। इस स्थान पर पीने का पानी, घडा आदि रखना उपयुक्त है। अगर उत्तर-पूर्व से किसी भी रूप में बहता जल प्रवाहित हो रहा हो, तो यह अति शुभ लक्षण है, जो आपको समृद्धि प्रदान करता है।

ह्ण    मकान का प्रवेद्गा द्वार उत्तर-पूर्व में होना शुभ फलदायक माना जाता है।

ह्ण    इस स्थान पर पौधे रखना, खासकर खिले हुए फूलों के पौधे या तुलसी का पौधा अति उत्तम है।

ह्ण    उत्तर-पूर्व स्थान का बढा होना परिवार को वंश-वृद्धि एवं सुख-सुविधाएं देता है।

ह्ण    अगर इस स्थान पर बेसमेंट बनाया जाए तो वह सर्वाधिक उपयुक्त है।

उत्तर-पूर्व की भांति मकान का दक्षिण-पद्गिमी हिस्सा भी अहम हैः-

 

 

ह्ण    मकान का दक्षिण-पद्गिचमी हिस्सा ऊंचा, मजबूत और ९० डिग्री के कोण पर होना चाहिए।

ह्ण    इस स्थान पर गृहस्वामी का द्गायनकक्ष हो।

ह्ण    दक्षिण-पश्चिम सीढ़ियों के लिए उपयुक्त है।

ह्ण    दक्षिण-पश्चिम में बैठक (ड्राइंगरूम) या पूजा का स्थान न बनाएं।

ह्ण    दक्षिण-पश्चिम में स्नानघर, शौचालय व बोरिंग इत्यादि न बनाएं। इस स्थान को ढलावदार या नहीं होना चाहिए।

ह्ण    दक्षिण- पश्चिम में कोई भी दोद्गा सीधा गृहस्वामी पर बुरा प्रभाव डालता है। वह किसी भी तरह ककी विकट परिस्थितयों में फंस सकता है।

ह्ण    घर हो या कार्यस्थल, दक्षिण- पश्चिम में कर्मचारियों के रहने का स्थान न बनाएं।

 

प्राकृतिक तत्वों में संतुलन कैसे बनाया जाए, यह निर्दिश्‍ट करता है वास्तु। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से इनकार नहीं करती। सुखी जीवन जीने के लिए प्रकृति से समन्वय और संतुलन बनाए रखना आवश्‍यक है। अगर आपके मकान/ कार्यस्थल की दक्षिण- पश्चिम व दक्षिण-पूर्व दिशा में कोई भी दोश है, तो उसे शीघ्रता से दूर कर अपने जीवन को तरक्की व सुख की राह पर अग्रसर करें।

प्रकर्ति (नेचर) एवं वास्तु

 

संसार पंचभूतों अर्थात अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश का मिश्रण है। विज्ञान हो या अध्यात्म, दोनों ही इसमें एकमत हैं। पांचों में से किसी भी तत्व की अधिकता या कमी असंतुलन पैदा कर देती है। मानव द्गारीर इसका उचित उदाहरण है। जल तत्व हमारे पैरों में, पृथ्वी तत्व घुटनों में, वायु तत्व नाभि में, अग्नि तत्व कंधों में जबकि वायु तत्व मस्तिष्‍क में पाया जाता है। द्गारीर में मौजूद इन पांचों तत्वों का आपसी संतुलन जब बिगड़ जाता है, उसी स्थिति में हम कमजोर या रोगग्रस्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप हम तनावग्रस्त हो जाते हैं और हमारी प्रगति बाधित हो जाती है। चाहे वह प्रगति भौतिक हो या आध्यात्मिक।

व्यक्ति किसी भी एक तत्व की गैर मौजूदगी में जीवित नहीं रह सकता। वास्तुशास्त्र अपनाकर आप न सिर्फ इन पंच महाभूतों में संतुलन स्थापित कर सकते हैं, बल्कि इनसे अपनी प्रगति का मार्ग भी प्रशस्‍त कर सकते हैं। मानव द्गारीर की तरह ही पंच तत्वों की भवन-निर्माण में भी अहमियत है। भवन निर्माण करते समय अगर इन पांचों तत्वों का खयाल रखा जाए, तो जीवन में सृजनात्मक (क्रिएटिव) उर्जा, विद्युत (इलेक्ट्रीकल) उर्जा और चुम्बकीय (मैग्नेटिक) ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है। यही प्रवाह हमें समृद्धि, स्वास्थ्य और संपन्नता एवं शांति प्रदान करता है।

 

प़थ्‍वी तत्व।

 

जीवन की संभावना केवल पृथ्वी पर है। उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के बीच चुम्बकीय आकर्शन हो या गुरुत्वाकर्शन बल, ये पृथ्वी पर मौजूद जड और चेतन सभी पदार्थों को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि किसी भी तरह के भवन-निर्माण से पूर्व भूमि-पूजन किया जाता है। निर्माण के लिए सही भूमि का चयन करना, दिशा उचित होना, भूमि के स्तर का उपयुक्त होना और निर्माणस्थल के आंतरिक व इर्द-गिर्द वातारवण का स्वच्छ होना, पृथ्वी तत्व को शुभ फलदायी बना देता है।

जल

 

पृथ्वी का ३/४ हिस्सा जल है। जल वह अवयव है, जो इस गृह पर जीवन को संभव बनाता है। चाहे मनुष्‍य हो या पेड़-पौधे और पद्गाु-पक्षी जल इन सबकी आवश्‍यकता है। जीवनदायिनी गैसों हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का मिश्रण है जल। जल का एक आवद्गयक तत्व है टेस्ट (आर.ए.एस.), जो हमारे जीवन में नई ऊर्जा का संचार करता है। ये सारे तथ्य जल तत्व की अहमियत दर्शाते हैं। आवश्‍यक  है कि जीवन की तरह हम अपने भवन अथवा कार्यस्थल में भी प्राणों का संचार करने के लिए जल को सही दिशा दें। पीने के पानी के टैंक या हैंडपम्प को सही दिशा में स्थापित कर हम जल तत्व को अपने अनुकुल बना सकते हैं।

 

 

अग्नि

 

जल की भांति अग्नि भी जीवन के लिए आवश्‍यक तत्व है। उश्‍मा और प्रकाश का स्रोत है अग्नि। विज्ञान कहती है कि सूर्य भी आग का ही गोला है। कहा जा सकता है कि जितना महत्व सौरमंडल में सूर्य का है, उतना ही महत्व मनुष्‍य जीवन में अग्नि का है। सिर्फ खाना पकाने तक नहीं, अग्नि का प्रयोग तमाम तरह के धार्मिक कर्मकांडों में आरंभ से किया जाता रहा है। बात चाहे गृहप्रवेश की हो या किसी अन्य पूजन-विधान की। अग्नि में आहुति देकर हम इन कर्मकांडों को पूरा करते हैं। हिंदु पद्धति में किसी भी धार्मिक कर्मकांड के संपन्न होने के लिए अग्नि देवता का आहवान किया जाता है।

आवश्‍यक है कि हमारे निवास स्थान में भी अग्नि तत्व पर्याप्त मात्रा व अनुपात में हो। अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाले उपकरणों जैसे- गीजर, गैस स्टोव, मिक्सी आदि को रसोईघर में दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थापित कर हम अग्नि तत्व को प्रभावशाली एवं संतुलित बना सकते हैं।

 

वायु

वायु यानी हवा को प्राणदायिनी कहा गया है अर्थात जो प्राणों का संचार करे। प्रकृति से मनुष्‍य को मिला हुआ एक और अमूल्य तोहफा है वायु। पृथ्वी के इर्द-गिर्द वायुमंडल विभिन्न गैसों (नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बनडाईआक्साइड, कार्बन-मोनोऑक्साइड आदि) एवं धूल कणों का मिश्रण है, जो हमारे जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। किसी भी भवन का उत्तर-पूर्व कोना पैरा-बैंगनी (अल्ट्रा वॉयलेट) किरणें और सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है। किंतु यदि इस स्थान पर आप कचरा रखना शुरू कर दे तो यह स्थान सकारात्मक ऊर्जा के स्थान पर नाइट्रोजन और कार्बनडाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें उत्पन्न करेगा। यही वजह है कि भवन निर्माण के समय खिड़की-दरवाजों व वेंटिलेशन का उचित प्रबंध किया जाता है, जिससे ताजा हवा भीतर प्रवेश कर सके और दूशित वायु बाहर जा सके।

 

आकाश

 

आकाश तत्व भी बाकी चारों तत्वों के समान महत्वपूर्ण है। आकाश तत्व ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है। यह तत्व हमारे जीवन में खुशहाली और समृद्धि का परिचायक है। माना जाता है कि अगर पृथ्वी, अग्नि और वायु तत्व अगर संतुलित हैं तो आकाश तत्व स्वयंएव प्रभावशाली बन जाता है।