Vastu

बिना तोड-फोड करें वास्‍तु समाधान

इसमें दो राय नहीं कि वास्‍तु पर लोगों का विश्‍वास बढ रहा है। घर हो, दफ्तर या मल्‍टी स्‍टोरी बिल्डिंग्‍स, ऑर्किटेक्‍ट और इंटीरियर डेकोरेटर की तरह वास्‍तु विशेषज्ञ के बजट को भी लोग अपने कंस्‍ट्रक्‍शन बजट में शामिल करने लगे हैं। बेशक यह निर्णय समझदारी पूर्ण है कि निर्माण के समय ही वास्‍तु विशेषज्ञ की राय ले ली जाए। मुसीबत तब उत्‍पन्‍न होती है जब हमें पता लगता है कि हमारे पूर्व निर्मित भवन में कोई गंभीर वास्‍तु दोष है। आनन-फानन में हम किसी परिचित या नौसिखिया वास्‍तु विशेषज्ञ से मशवरा कर डालते हैं और वह हमें भवन में तोड-फोड कर वास्‍तु दुरूस्‍त करने का परामर्श दे डालता है। भवन में तोड-फोड करना और पुन: निर्माण करना कोई हंसी-खेल तो है नहीं। फिर हमारा मानना है कि जब रोग का निदान दवाओं के जरिए हो सकता है तो भला ऑपरेशन करने की क्‍या आवश्‍यकता। हां, तोड-फोड के परामर्श लोगों का वास्‍तु से मोह अवश्‍य भंग कर देते हैं। आपको बता दें कि वास्‍तु तोड-फोड का शास्‍त्र कतई नहीं है। अगर आप भी ऐसा मानते आए हैं, तो अपनी यह भ्रान्ति तोड दीजिए। वास्‍तु शास्‍त्र में ऐसे कई प्रभावशाली उपाय एवं गजैट्स हैं, जिनके इस्‍तेमाल से किसी स्‍थान विशेष या स्थिति विशेष की वजह से बनने वाले वास्‍तु दोष का प्रभाव समाप्‍त या कमजोर हो जाता है। आइए जानते हैं, ऐसे कुछ वास्‍तु गैजेट्स के बारे में जिनकी सहायता से बिना तोड-फोड वास्‍तु दोष निवारण किया जा सकता है। पौधे- वास्‍तु शास्‍त्र में पौधों का विशेष महत्‍व है। खासकर तुलसी, बैम्‍बू ट्री, मनी प्‍लांट आदि। कुशल वास्‍तुशास्‍त्री कई प्रकार के वास्‍तु दोष निवारण केवल पौधों के माध्‍यम से करते हैं। उदाहरणार्थ अगर सीढियां ठीक प्रवेश द्वार के सामने बनी हों, तो वहां ऐसे पौंधों के गमले लगाकर वास्‍तु दोष निवारण किया जा सकता है। ऐसे ही कई और वास्‍तु दोषों का निवारण भी पौधों के माध्‍यम से संभव है। शीशे- शीशे यानी मिरर का वास्‍तु से गहरा संबंध है। कनवेक्‍स मिरर या फेंग्‍शुई पा-क्‍वा मिरर ऐसे चमत्‍काकरी गैजेट हैं, जिनकी सहायता से कई गंभीर वास्‍तु दोषों को दूर किया जा सकता है। किसी स्‍थान से नकारात्‍मक ऊर्जा के विस्‍थापन हेतु भी […]

उत्‍तर-पूर्व

किसी ने कहा है कि अगर वर्तमान का सदुपयोग कर लिया जाए तो भविष्‍य अपने आप सुखद हो जाएगा। युवा पीढी भी इसी वर्तमान की परिचायक है। भविष्‍य के सुखद और संपन्‍न होने के लिए युवा पीढी का स्‍वस्‍थ और सुकुशल होना जरूरी है। लेकिन ऐसा नहीं है। आजकल अधिकांश युवा अपनी बेलगाम महत्‍वाकांक्षाओं के चलते या तो डिप्रेशन के शिकार हैं या फिर अग्रेशन यानी आक्रामकता के। इसे भले ही हम युवा पीढी की नादानी या नासमझी कहकर नजरअंदाज कर दें, लेकिन वास्‍तव में यह एक मानसिक विकृति है, जिसके चलते न सिर्फ युवा संगीन अपराध कर बैठते हैं, बल्कि आत्‍महत्‍या की ओर भी अग्रसर होते हैं। आपको बता दें कि इस मानसिक स्थिति की एक बडी वजह वास्‍तु दोष भी है। अगर आपके घर का उत्‍तर-पूर्व यानी नॉर्थ-ईस्‍ट दोषपूर्ण तो आपके परिवार के युवा सदस्‍य इससे दुष्‍प्रभावित हो सकते हैं। आइए जानते हैं कि नॉर्थ-ईस्‍ट में किन दोषों से बचे रहकर हम अपने परिवार के युवा सदस्‍य की मानसिक सेहत का खयाल रख सकते हैं। नॉर्थ-ईस्‍ट यानी उत्‍तर-पूर्व को ईशान कोण भी कहा जाता है। ध्‍यान दें कि आपके घर का नॉर्थ-ईस्‍ट भाग कहीं कटा हुआ तो नहीं है। अगर ऐसा है तो यह निश्चित रूप से एक वास्‍तु दोष है, जिसका सीधा असर युवा सदस्‍यों की मानसिक क्षमता पर पडता है। वे डिप्रेशन या आत्‍मविश्‍वास की कमी और अवसाद की समस्‍या से घिर सकते हैं। नॉर्थ-ईस्‍ट का कटा होना जितना दोषपूर्ण है, इसके फर्श यानी धरातल का घर के अन्‍य भाग से ऊंचा होना भी उतना ही दोषपूर्ण है। कोशिश करें कि फर्श का लैवल घर के अन्‍य भाग की तुलना में नॉर्थ-ईस्‍ट में थोडा नीचा रखें। उत्‍तर-पूर्व यानी नॉर्थ-ईस्‍ट में टॉयलेट होना बीमारियों को आमंत्रित करता है। ऐसे भवन में युवा सदस्‍य तमाम तरह की शारीरिक व मानसिक बीमारियों से ग्रस्‍त पाए जा सकते हैं। ईशान कोण में बने टॉयलेट के साथ अगर युवाओं के निजी कक्ष या स्‍टडी अथवा कार्य करने के स्‍थल में भी वास्‍तु दोष है, तो बीमारी गंभीर रूप भी ले सकती है। ईशान में सीढियां नहीं होनी चाहिएं। वास्‍तु के नियमानुसार ईशान कोण को हल्‍का, प्रकाशवान होना चाहिए। ईशान को ईश्‍वर […]

वास्‍तु से बना अंडरवाटर टैंक लाता है समृद्धि

लिविंग रूम, बेडरूम, बॉलकनी और डाइनिंग रूम आदि की तरह भवन में जल स्रोत का भी विशेष महत्‍व होता है। जल संग्रह के लिए ओवरहेड वाटर टैंक अथवा अंडर वाटर टैंक का निर्माण किया जाता है। वाटर टैंक का निर्माण किस दिशा में किया जाए, इसका ज्ञान होना अत्‍यंत आवश्‍यक है। वास्‍तु के अनुरूप अंटरवाटर टैंक कहां होना चाहिए, आइए जानते हैं। जल स्रोत के लिए चाहे आप बोरवैल का निर्माण करें, कुएं का अथवा किसी अन्य रूप में भूमिगत जलाशय का,इस कार्य हेतु सबसे उचित दिशा उत्तर-पूर्व है। उत्तर-पूर्व में जलाश्य का निर्माण करने से गृह स्वामियों को समृद्धि मिलती है। उत्तर-पूर्वी भाग अन्य दिशाओं की अपेक्षा हल्का माना गया है। वास्तु कहता है कि इस भाग को खुला एवं हवादार रखना चाहिए। इस दृष्टिाकोण से भी उत्तर-पूर्व में भूमिगत जलाशय का निर्माण उचित है। इसका वैज्ञानिक आधार भी है। सुबह के सूर्य की किरणें जलाशय में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को समाप्त कर देती हैं। अगर उत्तर-पूर्वी भाग में जलाशय बनाना संभव न हो तो इसे भूखंड के उत्तर या पूर्वी भाग में बनाया जा सकता है। परंतु इसे दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पश्चिम भाग में नहीं बनाना चाहिए। दक्षिणी भाग में भूमिगत जलाशय होना घर की स्त्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वहीं पश्चिमी भाग में होने से परिवार के पुरुष सदस्यों का स्वास्थ्य खराब रहेगा एवं आर्थिक संकट उत्पन्न होगा। दक्षिण-पूर्व या दक्षिण-पद्गिचम में होने से महिलाओं को स्वास्थ्य, मान-सम्मान या अन्य किसी प्रकार की हानि हो सकती है। यही नहीं, इससे पुरुष सदस्यों को जानलेवा बीमारी तक हो सकती है। दक्षिण व दक्षिण-पश्चिम एवं उत्तर-पश्चिम में दीवारों का निर्माण संध्या के सूर्य की किरणों को घर में पड़ने से रोकने के लिए किया जाता है। अगर इनमें से किसी भाग में बोरवैल अथवा कुआं बनाया जाता है, तो वहां उसके रख-रखाव व मरम्मत के लिए बहुत ही कम स्थान शेष रह जाता है। इस व्यवहारिक दृष्टिाकेण से भी उक्त स्थानों पर जलाशय निर्माण उचित नहीं माना जाता। भूखंड के एकदम मध्य में जलाशय निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे वास्तु-विन्यास के आधार पर भवन की संरचना करना दुषकर कार्य होता है। इसके लिए विशाल […]

बेसमेंट के लिए वास्‍तु टिप्‍स

जमीन की कीमत या कहिए उसकी कमी के मद्देनजर उसका भरपूर इस्‍तेमाल किया जा रहा है। इसी का परिणाम है बेसममेंट्स की बढती संख्‍या। आजकल बेसमेंट्स का निर्माण धड़ल्‍ले से किया जा रहा है। बसेमेंट स्‍थान की कमी और जरूरत की भरपाई कर सकती है, इसमें दो राय नहीं, लेकिन इसका निर्माण करने से पूर्व वास्‍तु निमयों का ख्‍याल रखा जाए तो बेहतर है। चूंकि गलत तरीके से अथवा वास्‍तु नियमों की उपेक्षा कर बनाया गया बेसमेंट आपकी स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी व आर्थिक परेशानियों का सबब बन सकता है।

वास्‍तु के शुभ प्रतीक घर को बनाएं समृद्ध

आपके आवास को सुख, स्‍वास्‍थ्‍य, समृद्धि प्रदाता बनाने और निर्माण में हुए वास्‍तु दोषों का प्रभाव कम करने के लिए शुभ प्रतीकों का भी जिक्र आता है। आज हम ऐसे ही कुछ शुभ प्रतीकों की चर्चा कर रहे हैं, जिनका उपयोग स्‍वास्‍थ्‍य और सौभाग्‍य प्राप्ति के लिए अनादि काल से किया जाता रहा है। वास्‍तु के ये शुभ प्रतीक हैं- 1. ओम, 2. स्‍वास्तिक, 3. मंगल कलश, 4. पंचसूलक (पांच तत्‍वों की प्रतीक खुली हथेली की छाप), और 5. मीन।

टॉयलेट के लिए वास्तुच टिप्स

अमूमन देखने में आता है कि लोग टॉयलेट बनाने में असावधानी बरतते हैं या फिर भवन के बाकी हिस्‍सों की तरह टॉयलेट के निर्माण पर उतना ध्‍यान नहीं देते। ऐसा नहीं होना चाहिए। गलत दिशा में या गलत तरीके से बना टॉयलेट परिवार के लिए दुर्भाग्‍य का कारण बन जाता है। हालांकि वास्‍तु में इसके लिए उपाय हैं, लेकिन बेहतर यही है कि निर्माण के दौरान ही टॉयलेट की सही स्थिति का ध्‍यान रखा जाए। आइए, जानते हैं टॉयलेट की सही स्थिति के बारे में। टॉयलेट घर के उतरपश्चिम में बनाना चाहिए। इसे भूलकर भी घर के मध्‍य भाग में या उत्‍तरपूर्व में नहीं बनाना चाहिए। अगर टॉयलेट बेडरूम के साथ अटेच्‍ड बनाना हो तो इसे भी कमरे के उत्‍तरपश्चिम में बनाएं। उत्‍तरपश्चिम में अगर टॉयलेट बनाना संभव न हो तो इसे दक्षिण‍पूर्व में बना सकते हैं। उत्‍तरपूर्व दिशा कुबेर अर्थात धन की दिशा है। इस दिशा में बना टॉयलेट घर में आर्थिक हानि, तंगी लेकर आता है। इसका सीधा असर घर के मुखिया की समृद्धि और यश पर पडता है। इस स्थिति के कारण उसे अपयश का सामना करना पड सकता है। दक्षिणपश्चिम में बना टॉयलेट परिवार के सदस्‍यों को नुकसान पहुंचाता है, विशेषकर परिवार के मुखिया को। टॉयलेट से संबंधित कुछ और आवश्‍यक दिशा-निर्देश इस प्रकार हैं: टॉयलट सीट पश्चिम से पूर्व की ओर अथवा दक्षिण से उत्‍तर की ओर लगी हो। टॉयलेट में अगर शीशा लगाना हो तो उसे उत्‍तर व पूर्व की दीवार पर लगाया जा सकता है। दरवाजा पूर्व अथवा उत्‍तर-पूर्व में होना चाहिए। टॉयलेट में बडी खिडकी उत्‍तर में जबकि छोटी पश्चिम में लगानी चाहिए। टॅायलेट की दीवारों पर हल्‍के रंगों को प्रयोग करें। जहां तक संभव हो काले व लाल रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

प्रेम उत्‍सव है वेलेंटाइन

प्रेम उत्‍सव है वेलेंटाइन आप सबको मेरी ओर से वैरी हैप्‍पी वेलेंटाइन डे। वेलेंटाइन आज की पीढी में इस कदर लोकप्रिय है कि इसके विरोधियों को भी विरोध छोडकर प्रेम के रंगों में रंगे देखा जा सकता है। मैं आप लोगों को बता दूं कि जिसे हम वेलेंटाइन डे के रूप में मनाते हैं और उसे पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति की देन बताते हैं, असल में वह भारतीय संस्‍कृति का ही अटूट हिस्‍सा है। गौर किजिएगा वेलेंटाइन डे यानी 14 फरवरी के आसपास ही आती है बसंत पंचमी यानी बसंत का आगमन। बसंत को प्रेम का वक्‍त माना गया है। यही वह समय होता है, जब पतझड रूख्‍सत लेती है और नए फुल-पत्‍तों के रूप में बसंत सृष्टि का नया श्रंगार करता है। चारों और नवसृजन का उत्‍सव होता है। महान दार्शनिक वात्‍सयायन ने कामसूत्र में बसंत पंचमी को प्रेम के उत्‍सव का नाम दिया है। समूची प्रकृति के साथ नर व मादा भी सृष्टि के नव सृजन की भूमिका का निर्वाह करते हैं। बसंत के मौसम में मन में कोमल उमंगों को उठना स्‍वाभाविक होता है। मन वासनाओं के बहाव में बेलगाम न हो जाए, इस हेतु बसंत में पांच दिन पीले वस्‍त्र धारण कर दिन के समय मां सरस्‍वती की पूजा की जाती है, जिससे बुद्धि नियंत्रण में रहे और रात को नव-सृजन हेतु कामदेव का आह्वान किया जाता है। इसी से बसंत उत्‍सव सम्‍पूर्ण होता है। आज की पीढी इसे वेलेंटाइन के रूप में मनाती है। वेलेंटाइन हो या बसंत उत्‍सव दोनों में फर्क नहीं है। दोनों के अंतर में है तो प्रेम ही निहित।

वास्तु उपायों से करें तनाव का निदान

प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे। इसके लिए वह जी तोड़ मेहनत करता है। अपनी खून-पसीने की कमाई से अपने लिए घरौंदा बनाता है। यह घरौंदा सिर्फ उसका निवास स्थान नहीं होता, बल्कि उसका वह सपना होता है, जो हमेशा से उसकी आंखों में पल रहा होता है। घर बनाने के लिए वह क्या-क्या जतन नहीं करता। लोगों से परामर्श करता है, आर्किटेक्चर को बुलाकर नक्‍शा बनवाता है और तदनुरूप निर्माण करवाता है। उसके सपनों का घर, उसके लिए सौभाग्यशाली भी हो, इसके लिए उसे चाहिए कि वह घर बनाने के लिए स्थान का चयन और घर निर्माण कुशल वास्तु विशेषज्ञ की सलाह पर वास्तु नियमों के अनुसार करे। यूं तो वास्तु ने सभी दस दिशाओं को महत्वपूर्ण माना है, लेकिन उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम को विशेष अहमियत दी जाती है। कुछ इसी प्रकार जिस तरह मानव शरीर में हर अंग का अपना महत्व होते हुए भी सिर, जहां मस्तिद्गक का वास होता है और जो पूरे शरीर को संचालित करता है तथा पैर, जो कि शरीर का आधार होते हैं, को विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे ही उत्तर-पूर्व दिशा वास्तु पुरुष का सिर एवं दक्षिण-पश्चिम पांव हैं। इन दोनों में से किसी भी दिशा में वास्तु दोष होने का मतलब है गृहस्वामी सहित परिवार के अन्य सदस्यों को मानसिक तनाव होना। इस स्थिति से बचने के लिए हमें निम्न बातों का खयाल रखना चाहिएः- ह्ण     घर का उत्तर-पूर्वी कोना कटा हुआ न हो। यह आपकी आर्थिक उन्नति को बाधित करता है और नुकसान का कारण भी बनता है। ह्ण     उत्तर-पूर्वी कोना गोलाकार न बना हो। ह्ण     उत्तर-पूर्व में बना द्गाौचालय बीमारियों को आमंत्रित करता है। ह्ण     उत्तर-पूर्व में अगर नव दंपती के लिए द्गायन कक्ष बनाया जाए तो वह परिवार की वंश वृद्धि को रोक सकता है। इस दिशा में बने शयन कक्ष नव दंपती को शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम बना सकता है। ह्ण     उत्तर-पूर्व में बनायी गयी सीढियां भारी आर्थिक व शारीरिक क्षति का कारण बनती हैं। इसके कारण गृहस्वामी कर्ज में डूब सकता है। ह्ण     उत्तर-पूर्व में रसोईघर नहीं बनाना चाहिए। इस दिशा में बना रसोईघर मानसिक पीडा का कारण बनता है। यह अनावश्यक खर्च भी बढाता है। ह्ण     उत्तर-पूर्व में आप पूजा-स्थल बना सकते […]

वास्तु के अनुसार बनाएं बच्चों का शयनकक्ष

कहते हैं कि जहां बच्चों की किलकारियां नहीं गूंजती, उनकी शरारतों का द्गाोर नहीं होता, वह घर घर नहीं होता। बच्चे किसी भी परिवार की अहम कड़ी होते हैं। माता-पिता के लिए बच्चे उनके जीवन का मकसद होते हैं, जिनके लिए वे न जाने कितने त्याग करते हैं और कितनी ही कठिनाइयां सहन करते हैं। माता-पिता हर संभव प्रयास करते हैं, जिससे उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो सके। परंतु क्या बच्चे भी जानते हैं कि अपने माता-पिता के इन बलिदानों का कर्ज वे किस प्रकार चुकाएं। क्या करें, जिससे उनकी उम्मीदों पर खरा उतरकर समाज में उनका नाम रोशन कर सकें। जितना बडों के लिए आवश्यक है, बच्चों के लिए भी सही दिशा में शयन करना उतना ही जरूरी है। सही दिशा में शयन करने से नकारात्मक अनुभव मन-मस्तिष्क से धुल जाते हैं और जीवन को नयी प्रेरणा शक्ति प्राप्त होती है। जानते हैं कि बच्चों का बेडरूम कैसा हो- ह्ण     छोटे बच्चों का बेडरूम पश्चिम दिशा में बनाना चाहिए। वहीं लडकी का शयन कक्ष उत्तर-पश्चिम में बनाएं। जबकि लडके के लिए उत्तर एवं पूर्व दिशा में बेडरूम बनाएं। ह्ण     बच्चों के बेडरूम का दरवाजा उत्तर या पूर्व दिशा में हो और जहां तक हो सके दरवाजा एक ही लगाएं। ह्ण     कमरे में खिड कियां दरवाजे की विपरीत दिशा में हो। खिडकी अगर पश्चिमी दीवार पर हो, तो वह उत्तर व पूर्व की दीवार में बनी खिड की/खिडकियों की तुलना में छोटी होनी चाहिए। ह्ण     फर्नीचर दीवार से सटाकर नहीं, बल्कि कुछ इंच दूर रखें। ह्ण     बेड दक्षिण दिशा में रखना चाहिए। बेड के चारों ओर थोडा-सा खुला स्थान छोडें। अगर यह संभव न हो तो बेड को दक्षिण-पश्चिमी कोने में अथवा दक्षिणी या पश्चिमी कोने में रख सकते हैं। ह्ण     सोते समय बच्चों को अपना सिर पूर्व की ओर रखना चाहिए। इससे उनकी स्मरण-शक्ति बढ ती है। ह्ण     आलमारी या कैबिनेट को कमरे में दक्षिणी/पश्चिमी भाग में रखें। ह्ण     कम्प्युटर एवं टेलिविजन बच्चों के कमरे में नहीं रखने चाहिएं। अगर रखें तो टेलीविजन दक्षिण-पूर्व में जबकि कम्प्युटर पूर्वी दिशा में लगाएं। ह्ण     बच्चों के द्गायन कक्ष में एलसीडी मोनीटर नहीं लगाना चाहिए। एलसीडी मोनिटर बिस्तर के लिए शीशों का कार्य करता है और नकारात्मक ऊर्जा का संवाहक बनता है। ह्ण     कमरे में अगर स्टडी-टेबल रखनी हो […]

रोमांस, सेक्स और वास्तु

आप में से ज्यादातर लोगों को शायद यह अजीब लगे। लेकिन यह सत्य है कि वास्तु जितना आपके निवास, आपके रहन-सहन, आपकी सेहत, संपन्नता से संबंधित है, उतना ही गहरा संबंध लव, रोमांस और सेक्स से भी है। इस गंभीर, मगर रोचक विषय पर आगे बढ़ने से पहले हमें प्यार, सेक्स और रोमांस के अंतर को समझना जरूरी है। बहुत सारे लोग आज भी प्यार और सेक्स के बारे में जिक्र करना, शर्मनाक समझते हैं। सबसे पहले तो यह जानना आवश्‍यक है कि मानव जीवन में प्यार और सेक्स उसी तरह आवश्यक हैं, जिस तरह भोजन में नमक-मिर्च। अधिकांश लोग आज भी प्यार और सेक्स को एक ही समझते हैं यानी कि वे इन दोनों में कोई अंतर नहीं देखते। वास्तविकता यह नहीं है। प्यार और सेक्स में उतना ही बडा अंतर है, जितना दिन और रात में। एक-दूसरे से संबंधित होकर भी ये एक-दूजे से अलग हैं। प्यार अगर आत्मा है, तो सेक्स शरीर है। बिना आत्मा के द्गारीर का कोई मतलब नहीं। सच्चे प्यार सरीखा दुनिया में दूसरा कुछ नहीं है। उसकी कोई कीमत नहीं है और न हो सकती है। पृथ्वी पर सच्चे प्यार का सबसे बडा उदाहरण है मां का बच्चे के प्रति प्रेम। निस्वार्थ और निर्झर प्रेम। ऐसा ही प्रेम पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका के बीच होता है, जहां दूसरे की खुशी के लिए वे बडे से बडा त्याग करने से भी नहीं चूकते। इतिहास में सच्चे प्रेम के अनेक उदाहरण हैं। जैसे- लैला-मजनूं, हीर-रांझा, सोनी-महिवाल, ससी-पुन्नू। ये सारे प्रेमी इसलिए अमर हो गए क्योंकि इनमें एक-दूसरे के प्रति केवल शारीरिक भूख या आकर्शन नहीं, बल्कि आत्मीय प्रेम था। रोमांस और प्रेम प्रेम की पराकाष्ठा रोमांस है। रोमांस की खुशी, इसके सम्पर्ण भाव और उत्तेजना का वर्णन करना आसान नहीं है। कह सकते हैं कि तमाम शारीरिक बंधनों और आकर्द्गानों से परे रोमांस एक अवर्णनीय सुखद अनुभूति है। राधा-कृद्गण, सावित्री-सत्यवान, शकुन्तला-दुष्यंत का संबंध प्यार की ऐसी ही पराकाष्‍ठा थी। सेक्स सेक्स की एक साधारण परिभाषा यह हो सकती है कि यह प्रकृति का ऐसा नियम है, जो सृष्टि के विकास के लिए बना है। नए जीवन की उत्पत्ति हेतु किया जाने वाला शारीरिक यज्ञ है-सेक्स। यह वह शक्ति है, जो विपरीत लिंगी को अपनी ओर आकर्षित करती है। हां, इस आकषर्न या शक्ति की तुलना सच्चे प्यार से […]