Eight Directions & Importance

पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र

क्या है पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र? यह तो विदित ही है कि वास्तु में दिशाओं का अति-विशेष महत्व होता है। दिषाओं के निर्धारण और उनके विभिन्न प्रभावों के लिए जिस तरह सूर्य उत्तरदायी है, उसी तरह या कहिए कि उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की है। सूर्य की भांति पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का भी मानव जीवन पर स्‍पष्‍ट प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र भारत्तोलक चुम्बक की भांति है। पृथ्वी की निर्माण प्रक्रिया के दौरान खनीज व धातु जैसे भारी अवयव उसकी आंतरिक सतह में चले गए,  उन्हींने पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण किया। दक्षिणी व उत्तरी धुव्र के बीच स्थित पृथ्वी का यह चुम्बकीय क्षेत्र उसकी परिक्रमा व विद्युत करंट के लिए भी उत्तरदायी है। चुम्बकीय क्षेत्र का जन-जीवन पर प्रभाव आदि काल से मानव यह बात जानता है कि पक्षियों में दिशा-ज्ञान होता है। मौसम और पर्यावरण परिस्थितियों में बदलाव के साथ पक्षी भी अपना स्थान बदल लेते हैं। वे अपने मूल स्थान से हजारों मील दूर चले जाते हैं। बावजूद इसके वे अपने मूल स्थान को नहीं भूलते और पुनः पर्यावरण बदलाव पर वापस लौट आते हैं। हालांकि यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हो सका है, लेकिन माना जाता है कि पक्षियों में जो दिशा-ज्ञान होता है,  उसकी वजह पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र ही है। इसका एक और प्रमाण समुद्री वैज्ञानिकों से मिलता है। समुद्री वैज्ञानिकों के लिए यह तथ्य शोध का विषय है कि कछुए महासागर क्षेत्र का ८००० मील का सफर तय करते हुए वापस अपने आरंभिक स्थल पर लौट आते हैं। जैसे उनके भीतर भी दिशासूचक यंत्र लगे हों। इस मामले भी वैज्ञानिकों का मत है कि संभवतः इसके लिए पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र उत्तरदायी है। वास्तु में चुम्बकीय क्षेत्र का महत्व यह आश्‍चर्यजनक सत्य है कि हजारों वर्द्गा पूर्व भी ऋषि मुनि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी रखते थे। वे जानते थे कि चुम्बकीय क्षेत्र का पृथ्वी जगत पर रहने वाले सजीव व निर्जिव जगत पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने भवन-निर्माण अर्थात वास्तु के दिशा –निर्देश का वर्णन किया।  वास्तुशास्‍त्र कहता है कि मानव रीर भी चुंबक की भांति कार्य करता है, जिसमें […]

वास्तुशास्‍त्र की आठ प्रमुख दिशाएं एवं उनक महत्व

वास्तुशास्‍त्र की आठ प्रमुख दिशाएं एवं उनक महत्व   वास्तुशास्‍त्र में आठ प्रमुख दिशाओं का जिक्र आता है, जो मनुद्गय के समस्त कार्य-व्यवहारों को प्रभावित करती हैं। इनमें से प्रत्येक दिशा का अपना-अपना विशेष महत्व है। अगर आप घर या कार्यस्थल में इन दिशाओं के लिए बताए गए वास्तु सिद्धांतों का अनुपालन करते हैं, तो इसका सकारात्मक परिणाम आपके जीवन पर होता है। इन आठ दिद्गााओं को आधार बनाकर आवास/कार्यस्थल एवं उनमें निर्मित प्रत्येक कमरे के वास्तु विन्यास का वर्णन वास्तुशास्‍त्र में आता है। वास्तुशास्‍त्र कहता है कि ब्रहांड अनंत है। इसकी न कोई दशा है और न दिशा। लेकिन हम पृथ्वीवासियों के लिए दिद्गााएं हैं। ये दिद्गााएं पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने वाले गृह सूर्य एवं पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर आधारित हैं। यहां उल्लेखनीय है कि आठों मूल दिद्गााओं के प्रतिनिधि देव हैं, जिनका उस दिशा पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका विस्तृत वर्णन नीचे किया गया है। यहां हम आठ मूलभूत दिशाओं और उनके महत्व के साथ-साथ प्रत्येक दिशा के उत्तम प्रयोग का वर्णन कर रहे हैं। चूंकि वास्तु का वैज्ञानिक आधार है, इसलिए यहां वर्णित दिशा-निर्देश पूर्णतः तर्क संगत हैं। पूर्व- इस दिशा के प्रतिनिधि देवता सूर्य हैं। सूर्य पूर्व से ही उदित होता है। यह दिशा शुभारंभ की दिशा है। भवन के मुखय द्वार को इसी दिद्गाा में बनाने का सुझाव दिया जाता है। इसके पीछे दो तर्क हैं। पहला- दिशा के देवता सूर्य को सत्कार देना और दूसरा वैज्ञानिक तर्क यह है कि पूर्व में मुखय द्वार होने से सूर्य की रोशनी व हवा की उपलब्धता भवन में पर्याप्त मात्रा में रहती है। सुबह के सूरज की पैरा बैंगनी किरणें रात्रि के समय उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को खत्म करके घर को ऊर्जावान बनाएं रखती हैं। उत्तर- इस दिशा के प्रतिनिधि देव धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा ध्रूव तारे की भी है। आकाश में उत्तर दिशा में स्थित धू्रव तारा स्थायित्व व सुरक्षा का प्रतीक है। यही वजह है कि इस दिशा को समस्त आर्थिक कार्यों के निमित्त उत्तम माना जाता है। भवन का प्रवेश द्वार या लिविंग रूम/ बैठक इसी भाग में बनाने का सुझाव दिया जाता है। भवन के उत्तरी भाग को […]