Vastu

पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र

क्या है पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र? यह तो विदित ही है कि वास्तु में दिशाओं का अति-विशेष महत्व होता है। दिषाओं के निर्धारण और उनके विभिन्न प्रभावों के लिए जिस तरह सूर्य उत्तरदायी है, उसी तरह या कहिए कि उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र की है। सूर्य की भांति पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का भी मानव जीवन पर स्‍पष्‍ट प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र भारत्तोलक चुम्बक की भांति है। पृथ्वी की निर्माण प्रक्रिया के दौरान खनीज व धातु जैसे भारी अवयव उसकी आंतरिक सतह में चले गए,  उन्हींने पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण किया। दक्षिणी व उत्तरी धुव्र के बीच स्थित पृथ्वी का यह चुम्बकीय क्षेत्र उसकी परिक्रमा व विद्युत करंट के लिए भी उत्तरदायी है। चुम्बकीय क्षेत्र का जन-जीवन पर प्रभाव आदि काल से मानव यह बात जानता है कि पक्षियों में दिशा-ज्ञान होता है। मौसम और पर्यावरण परिस्थितियों में बदलाव के साथ पक्षी भी अपना स्थान बदल लेते हैं। वे अपने मूल स्थान से हजारों मील दूर चले जाते हैं। बावजूद इसके वे अपने मूल स्थान को नहीं भूलते और पुनः पर्यावरण बदलाव पर वापस लौट आते हैं। हालांकि यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हो सका है, लेकिन माना जाता है कि पक्षियों में जो दिशा-ज्ञान होता है,  उसकी वजह पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र ही है। इसका एक और प्रमाण समुद्री वैज्ञानिकों से मिलता है। समुद्री वैज्ञानिकों के लिए यह तथ्य शोध का विषय है कि कछुए महासागर क्षेत्र का ८००० मील का सफर तय करते हुए वापस अपने आरंभिक स्थल पर लौट आते हैं। जैसे उनके भीतर भी दिशासूचक यंत्र लगे हों। इस मामले भी वैज्ञानिकों का मत है कि संभवतः इसके लिए पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र उत्तरदायी है। वास्तु में चुम्बकीय क्षेत्र का महत्व यह आश्‍चर्यजनक सत्य है कि हजारों वर्द्गा पूर्व भी ऋषि मुनि पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी रखते थे। वे जानते थे कि चुम्बकीय क्षेत्र का पृथ्वी जगत पर रहने वाले सजीव व निर्जिव जगत पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने भवन-निर्माण अर्थात वास्तु के दिशा –निर्देश का वर्णन किया।  वास्तुशास्‍त्र कहता है कि मानव रीर भी चुंबक की भांति कार्य करता है, जिसमें […]

वास्तुशास्‍त्र की आठ प्रमुख दिशाएं एवं उनक महत्व

वास्तुशास्‍त्र की आठ प्रमुख दिशाएं एवं उनक महत्व   वास्तुशास्‍त्र में आठ प्रमुख दिशाओं का जिक्र आता है, जो मनुद्गय के समस्त कार्य-व्यवहारों को प्रभावित करती हैं। इनमें से प्रत्येक दिशा का अपना-अपना विशेष महत्व है। अगर आप घर या कार्यस्थल में इन दिशाओं के लिए बताए गए वास्तु सिद्धांतों का अनुपालन करते हैं, तो इसका सकारात्मक परिणाम आपके जीवन पर होता है। इन आठ दिद्गााओं को आधार बनाकर आवास/कार्यस्थल एवं उनमें निर्मित प्रत्येक कमरे के वास्तु विन्यास का वर्णन वास्तुशास्‍त्र में आता है। वास्तुशास्‍त्र कहता है कि ब्रहांड अनंत है। इसकी न कोई दशा है और न दिशा। लेकिन हम पृथ्वीवासियों के लिए दिद्गााएं हैं। ये दिद्गााएं पृथ्वी पर जीवन को संभव बनाने वाले गृह सूर्य एवं पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर आधारित हैं। यहां उल्लेखनीय है कि आठों मूल दिद्गााओं के प्रतिनिधि देव हैं, जिनका उस दिशा पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इसका विस्तृत वर्णन नीचे किया गया है। यहां हम आठ मूलभूत दिशाओं और उनके महत्व के साथ-साथ प्रत्येक दिशा के उत्तम प्रयोग का वर्णन कर रहे हैं। चूंकि वास्तु का वैज्ञानिक आधार है, इसलिए यहां वर्णित दिशा-निर्देश पूर्णतः तर्क संगत हैं। पूर्व- इस दिशा के प्रतिनिधि देवता सूर्य हैं। सूर्य पूर्व से ही उदित होता है। यह दिशा शुभारंभ की दिशा है। भवन के मुखय द्वार को इसी दिद्गाा में बनाने का सुझाव दिया जाता है। इसके पीछे दो तर्क हैं। पहला- दिशा के देवता सूर्य को सत्कार देना और दूसरा वैज्ञानिक तर्क यह है कि पूर्व में मुखय द्वार होने से सूर्य की रोशनी व हवा की उपलब्धता भवन में पर्याप्त मात्रा में रहती है। सुबह के सूरज की पैरा बैंगनी किरणें रात्रि के समय उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को खत्म करके घर को ऊर्जावान बनाएं रखती हैं। उत्तर- इस दिशा के प्रतिनिधि देव धन के स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा ध्रूव तारे की भी है। आकाश में उत्तर दिशा में स्थित धू्रव तारा स्थायित्व व सुरक्षा का प्रतीक है। यही वजह है कि इस दिशा को समस्त आर्थिक कार्यों के निमित्त उत्तम माना जाता है। भवन का प्रवेश द्वार या लिविंग रूम/ बैठक इसी भाग में बनाने का सुझाव दिया जाता है। भवन के उत्तरी भाग को […]

वास्तु एवं धर्म- मंदिर भी होते हैं वास्तु सम्मत

वास्तु एवं धर्म- मंदिर भी होते हैं वास्तु सम्मत भारत की सांस्कृतिक विरासत और अध्यात्म इसकी सबसे बड़ी पहचान है। जिन लोगों की यह धारणा है कि वास्तु केवल भवनों एवं व्यवसायिक स्थलों के लिए महत्वपूर्ण होता है, वे गलत सोचते हैं। वास्तु धार्मिक स्थलों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला से हमें इस बात के अनेक प्रमाण मिल सकते हैं। मंदिर का वास्तु वहां प्रतिमा के रूप में विराजमान देवी/देवता, वहां लगाए गए पेड -पौधों, दीवारों के रंगों और स्थान के आकार के बीच संतुलन दर्शाता है। मंदिर का निर्माण करना धार्मिक एवं पवित्र कार्य है। मंदिर में कुछ मूल अवयव होते हैं, जैसे- गर्भगृह, प्रदक्षिणा मार्ग, बुर्ज अथवा शिखर और सभामंडप एवं अंतराल आदी। गर्भगृह वह होता है, जहां मंदिर के प्रमुख देवता की प्रतिद्गठा की जाती है। अपने आराध्य देव की प्रतिमा के गिर्द बने जिस स्थान पर भक्तगण परिक्रमा लगाते हैं, उसे प्रदक्षिणा पथ कहा जाता है। गर्भगृह के ऊपर जो मीनार या बुर्ज होता है, उसे हम शिखर अथवा गोपुरम कहते हैं। अमूमन गर्भगृह एक आयातकार कक्ष में खुलते हैं, इस कक्ष को अन्तराल कहा जाता है। मंडप में आने के लिए एक अर्धमंडप अथवा द्वारमंडप होता है। वहीं मंडप स्तंभों पर निर्मित एक सभाभवन होता है।   मंदिर वास्तुशिल्‍प उसके अंगों के अनुसार तीन प्रकार का होता है- नगर,  द्रविड और वेसर। हिंदू परम्परा के अनुसार, मंदिर मानव शरीर के अनुरूप होता है। मंदिर का शीष भाग सिर,गर्भगृह उसकी ग्रीवा, सामने का मंदिर उदर, प्रदक्षिणा पथ की दीवारें टांगें और गोपुर चरण होते हैं। देवता या भगवान की प्रतिमा मंदिर रूपी शरीर की आत्मा यानी जीव है। मंदिर निर्माण हेतु दिशा-निर्देश ह्ण     मंदिर या धर्मस्थल का निर्माण करने के लिए सबसे पहले जरूरत है सही निर्माण स्थल का चयन करने की। ह्ण     वर्गाकार अथवा आयताकार प्लॉट मंदिर/धर्मस्थल के निर्माण के लिए उपयुक्त माना जाता है। मंदिर की चारदीवारी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के समकक्ष होनी चाहिए। ह्ण     मंदिर परिसर के फर्श की ढलान दक्षिण से उत्तर की ओर तथा पश्चिम से पूर्व की तरफ होनी चाहिए। दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की तरफ फर्द्गा की ढलान सर्वोत्तम होती है। मंदिर परिसर के पूर्व अथवा उत्तर दिशा में अगर समुद्र या नदी है तो परिसर में उत्तर-पूर्व की ओर ढलान […]

बाथरूम के इंटीरियर को भी बनाएं खास

बाथरूम के इंटीरियर को भी बनाएं खास  बाथरूम का इंटीरियर भी आपकी आंखों को सुकून देता है। यह घर का वह निजी हिस्सा है, जिसका उपयोग अमूमन परिवार के सदस्य करते हैं। इसका इंटीरियर कैसा हो, यह जानना बेहद आवश्यक है।      बाथरूम में वेंटिलेशन अर्थात हवा व प्रकाद्गा का पर्याप्त प्रबंध हो।      बाथटब/शॉवर को उत्तर, उत्तर-पूर्व या पूर्व में लगवाएं।      कॉमोड बाथरूम के पश्चिम , दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम इस प्रकार बनवाना चाहिए कि उसका मुख उत्तर-दक्षिण में हो।      बाथरूम के फर्द्गा की ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर या पूर्व से पश्चिम की तरफ हो।      वाशबेसिन बाथरूम के पश्चिम, उत्तर या पूर्वी भाग में हो।      बाथरूम में शीशा उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व में लगाएं।      बाथरूम की दीवारों के रंग भी चटक न रखें।

कैसा हो बेडरूम का वास्तु सम्मत इंटीरियर

डाइनिंगरूम की साज-सज्जा   ड्राइंगरूम के बाद हम बात करते हैं, डाइनिंग रूम की। डाइनिंग रूम की साज-सज्जा करने से पूर्व निम्न बातों पर ध्यान दें:- ह्ण     डाइनिंग टेबल दीवारों से न सटी हो। बेहतर हो कि उसे कमरे के मध्य भाग में स्थापित किया जाए। ह्ण     डाइनिंग टेबल की मेज-कुर्सियों के कोने धारदार अर्थात नुकीले न हों। ह्ण     वास्तु के अनुसार, बाथरूम को डाइनिंग रूम के नजदीक निर्मित नहीं किया जाना चाहिए। ह्ण     डाइनिंग रूम की उत्तर/उत्तर-पूर्व व पूर्व की दीवारों पर सौंदर्य के लिए आदमकद शीशे लगाए जा सकते हैं। ह्ण     डाइनिंग रूम का इंटीरियर घर के मुखय द्वार से दिखाई नहीं देना चाहिए। ह्ण     डाइनिंग रूम में प्रकाश की उचित व्यवस्था हो। कैसा हो बेडरूम का वास्तु सम्मत इंटीरियर दिनभर की थकान के बाद हम घर पहुंचकर अपने बेडरूम में विश्राम करते हैं। यह वह स्थान है, जहां पहुंचकर हमें सारे तनावों से मुक्त हो जाना चाहिए। इसीलिए इसका इंटीरियर स्वतः महत्वपूर्ण हो जाता है। ह्ण     बेड व बेडरूम में प्रेवश करने का द्वार एक ही दिशा में नहीं होना चाहिए। ह्ण     डे्रसिंग टेबल को उत्तर या पूर्व दिशा की दीवार के पास रखें। ह्ण     अगर बेडरूम में स्टडी टेबल रखते हैं, तो उसे इस प्रकार रखा जाए कि वहां बैठकर अध्ययन करने के दौरान आपका मुंह उत्तर या पूर्व की ओर हो। ह्ण     ड्रेसिंग टेबल के अतिरिक्त अन्य शीशों व टेलीविजन को बेडरूम में रखने से बचना चाहिए।

ड्राइंगरूम (लिविंग रूम) का इंटीरियर

ड्राइंगरूम (लिविंग रूम) का इंटीरियर ड्राइंग रूम घर का सबसे खूबसूरत स्थान होता है। यह वह स्थान होता है, जहां न सिर्फ आप अपना दिनभर का अधिकांश समय बीताते हैं, बल्कि आगंतुकों की मेहमाननवाजी भी करते हैं। आगंतुक को आपके घर की साज-सज्जा, आपकी जीवनशैली और इंटीरियर के बारे में समझ का अंदाजा ड्राइंगरूम को देखकर ही हो जाता है। इसीलिए महत्वपूर्ण है कि आप अपने ड्राइंगरूम को किस प्रकार सुसज्जित करते हैं। ड्राइंगरूम का इंटीरियर इस प्रकार का होना चाहिए कि वहां चलने-फिरने के लिए पर्याप्त स्थान हो। ड्राइंगरूम में फर्नीचर दीवारों से सटाकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनके पीछे इतना स्थान अवश्य हो कि वहां हवा का प्रवाह बना रहे, जिससे कमरे में पर्याप्त ऊर्जा बनी रहे। जब आप अपना ड्राइंगरूम सजाएं तो इन बातों पर अवद्गय ध्यान दें- ह्ण     सोफा सेट को दक्षिण या पश्चिमी हिस्से की दीवार के पास रखें। ह्ण     पानी के द्गाो-पीस जैसे फाउंटेन या फिश एक्वेरियम कक्ष के उत्तरी कोने में रखने चाहिएं। ह्ण     अग्नि एवं वायु एक-दूजे के पूरक अर्थात मित्र माने जाते हैं। अगर कक्ष में फायर प्लेस बनाना चाहते हैं, तो उसे दक्षिण-पूर्व या उत्तर-पद्गिचमी भाग में बनाएं। ह्ण     ड्राइंग रूम में प्राकृतिक रोद्गानी पर्याप्त मात्रा में रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए कक्ष की उत्तरी या पूर्वी दीवार में बड़ी खिड कियां बनानी चाहिए। ह्ण     ड्राइंगरूम की दीवारों के रंग हल्के हों। ह्ण     दीवारों के रंग छत के रंग से अलग हों। ह्ण     कक्ष में ऐसी कोई तस्वीरें या द्गाो-पीस न हों, जो युद्ध, मौत और गुस्से को दर्शाते हों।

वास्तुशास्त्र के अनुसार, भूखंड के लैवल को कैसे सुधारा जाए

वास्तुशास्त्र के अनुसार, भूखंड के लैवल को कैसे सुधारा जाए हालांकि महानगरों में वास्तु सम्मत भूखंड का मिलना आसान नहीं होता, लेकिन वास्तु में ऐसे भी उपाय हैं, जिनके द्वारा भूखंड में मौजूद वास्तु दोश सुधारा जा सकता है। अगर उत्तर-पूर्वी कोना भूखंड में ऊंचा है और उसकी ढलान दक्षिण-पश्चिमी भाग की तरफ है तो इसे आसानी से सुधारा जा सकता है। इसके लिए आप उत्तर-पूर्वी भाग से मिट्‌टी की खुदाई करवाकर उसे दक्षिण-पश्चिम भाग में डलवा दें। ऐसा करने से भूखंड का ढलाव वास्तु सम्मत अर्थात दक्षिण-पश्चिम  से उत्तर-पूर्व की ओर हो जाएगा। जिस भूखंड का मध्य भाग उभरा हुआ है, उसमें भी इसी प्रकार सुधार किया जा सकता है। भूखंड के मध्य भाग से मिट्‌टी की खुदाई करके आप उक्त मिट्‌टी को दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में एकत्रित कर सकते हैं। भूखंड के मध्य भाग में गड्‌ढा होने पर भी ऐसा ही उपाय प्रयोग में ला सकते हैं। भूखंड के अन्य हिस्सों से मिट्‌टी की खुदाई करके उससे मध्य भाग में स्थित गड्‌ढे को भरा जा सकता है। खुदाई और भराव के दौरान यह अवश्य ध्यान रखें कि भूखंड का दक्षिण-पश्चिम कोना ऊंचा हो तथा ढलाव उत्तर-पूर्व की ओर हो।

भूखंड के लिए सर्वोत्तम दिशा कौन सी है?

दिशा निर्धारण क्यों? प्राचीन धर्म-ग्रन्थों में सूर्य को जीवनदायक बताया गया है। यह भी वर्णित किया गया है कि भवन निर्माण के दौरान सूर्य की स्थिति को विद्गोद्गा महत्व दिया जाता है। भवन का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि वहां निवास करने वाले सदस्य सुबह के सूरज की पैरा-बैंगनी किरणों से लाभान्वित हो सकें। ये किरणें हमें विटामिन-डी प्रदान करती हैं। वहीं दोपहर के सूरज की अल्ट्रा-रेड किरणों से बचाव हो सके। इसी आधार पर घर के पूर्वी (जहां सुबह के सूरज का प्रकाद्गा पड़ता है) एवं उत्तरी भाग (जहां सूर्य का प्रकाद्गा लगातार और लम्बी अवधि तक रहता है) में ऐसे कक्षों का निर्माण किया जाता है, जहां परिवार के सदस्य अपना दिनभर का अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, जबकि दक्षिण व पश्चिम भाग में रात्रि विश्राम के लिए शयन कक्ष आदी का निर्माण किया जाता है। इस प्रकार किसी भी भवन का ले-आउट या वास्तु सूर्य की स्थिति पर निर्भर करता है। प्रत्येक भूखंड का ले-आउट भिन्न होता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि उक्त भूखंड का मुख किस दिशा की ओर है। भूखंड के लिए सर्वोत्तम दिशा कौन सी है? प्राचीन वास्तुशास्त्रों में वर्णित दिशा-निर्देशों के अनुसार भूखंड के लिए आदर्श दिशा का निर्धारण सामान्य बुद्धि, तर्क और विज्ञान पर आधारित होता है। वास्तु के अनुसार, प्रत्येक दिशा उत्तम होती है और प्रत्येक दिशा का अपना महत्व है। जहां तक बात है अंतर की, तो गांवों या कस्बों की तुलना में द्गाहरों एवं महानगरों में भूखंडों की स्थिति में मुखय अंतर यह होता है कि यहां सभी चारों दिशाओं  में मार्ग/सड़कें होती हैं, जिनके दोनों ओर भवन निर्मित होते हैं। वास्तव में यही वास्तु-विन्यास द्गाहर को खूबसूरत भी बनाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वास्तु के अनुसार, प्रत्येक दिशा  महत्वपूर्ण है। जरूरत हमें उस दिशा विशेष के महत्व को जानने और तदनुरूप उसका उपयोग करने की है। पूर्वोन्मुखी भूखंड बुद्धिजीवियों अर्थात लेखक, शिक्षक, छात्र/छात्रा, दार्शनिक, पादरी या प्रफेसर आदी के लिए उत्तम होती है। चूंकि इस दिद्गाा से सूर्य उदय होता है, इसलिए यह दिशा जागरूकता की ज्ञान-प्रकाश की दिशाएं होती है। उत्तर दिद्गाा मुखी भूखंड उच्च पदों पर आसीन अधिकारियों, व्यवस्थापकों और सरकारी मुलाजिमों के लिए बेहतर होते हैं। वहीं दक्षिण-मुखी प्लॉट […]

भूखंड के ढलाव से संबंधित वास्तु दिशा-निर्देश

भूखंड के ढलाव से संबंधित वास्तु दिशा-निर्देश भूखंड का चयन करने में भूमि का ढलाव भी महत्वपूर्ण होता है। उपरोक्त दिशा-निर्देशों के साथ-साथ भूखंड की सतह के ढलाव का भी परीक्षण करना चाहिए। कैसा ढलाव आदर्द्गा होता है, इसी का वर्णन हम यहां कर रहे हैं। ढलाव परीक्षण के लिए भूखंड को मूलतः दो भागों में बांटा जाता है। उत्तर-पूर्व भाग को सूर्य का क्षेत्र तथा दक्षिण-पश्चिमी भाग को चंद्रमा का क्षेत्र माना जाता है। आदर्द्गा भूखंड में ढलाव दक्षिण-पश्चिम  से उत्तर-पूर्व की ओर होता है यानी की चंद्रमा का क्षेत्र सूर्य के क्षेत्र की तुलना में ऊंचा होना चाहिए। इसको अधिक विस्तार से ऐसे समझा जा सकता हैः- उत्तर-पूर्व कोना भूखंड में सबसे ढलाव पर यानी सबसे नीचा होना चाहिए। उत्तर-पश्चिम को उत्तर-पूर्व की तुलना में थोड ा ऊंचा होना चाहिए। दक्षिण-पूर्व भाग उत्तर-पूर्व से ऊंचा हो। इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिम को दक्षिण-पूर्व से अधिक ऊंचा होना चाहिए। मतलब यह कि भूखंड का उत्तर-पूर्व कोने का स्तर सबसे निम्नतम, जबकि दक्षिण-पश्चिम का सर्वाधिक ऊंचा होना चाहिए। उत्तर-पूर्वी कोने का न्यूनतम होना इस कोण पर पड़ने वाली सुबह के सूरज की किरणों से घर में प्रकाश व ऊर्जा का संचार बनाए रखता है। इसी प्रकार दक्षिण-पश्चिमी कोना दोपहर के सूरज की अल्ट्रा रेड किरणों से घर को गर्म होने से बचाता है। जिस भूखंड का केंद्र शेष धरातल से उभरा हुआ हो अथवा केंद्र में गड्‌ढा हो, ऐसा भूखंड भी उत्तम नहीं माना जाता। ऐसे भूखंड के धरातल को समानांतर करवाने में खासी धनराशि व्यय करनी पड ती है। केंद्र उभरा होने से इस बात की आशंका भी रहती है कि भूखंड का गर्भ पत्थरीला हो। अगर ऐसा होता है तो उसके गर्भ को विस्फोट के माध्यम से सामान्य करना पडेगा। इसके लिए भी भू-स्वामी को अतिरिक्त व्यय करना होगा। भूखंड का स्तर सड क के लैवल से ऊंचा होना चाहिए। भवन व सड क के बीच जल की निकासी के लिए नाली बनायी जाती है। अगर अत्यधिक वर्षा के कारण नाली का पानी अगर बाहर निकलने लगे तो वह मकान में प्रवेद्गा न करके बाहर सडक पर निकल जाए। इसके साथ ही भवन में जो अतिरिक्त पानी हो वह भी आसानी से बाहर निकल […]

ऐसे भी कर सकते हैं मिट्‌टी का परीक्षण

ऐसे भी कर सकते हैं मिट्‌टी का परीक्षण प्राचीन वास्तुद्गाास्त्री किंग भोज ने मिट्‌टी के परीक्षण की दो तकनीकों का जिक्र किया है। इन तकनीकों के माध्यम से भी आप मिट्‌टी की अनुकूलता का पता लगा सकते हैं। पहली विधि मिट्‌टी परीक्षणः प्लॉट के मध्य में २ फुट गहरे, २ फुट लंबे और २ ही फुट चौड़ा एक गड्‌ढा बनाएं। गड्‌ढे को खोदी गयी मिट्‌टी से भर दें। यदि गड्‌ढा भरने के पद्गचात्‌ मिट्‌टी बच जाती है,तो वह प्लॉट अनुकूल है। खोदी गयी मिट्‌टी से गड्‌ढा पर्याप्त रूप से भर जाता है, तो वह भूमि औसत है। किंतु अगर खोदी गयी मिट्‌टी से गड्‌ढा पूरी तरह नहीं भर पाता है, तो ऐसी भूमि अनुकूल नहीं मानी जाती। जल परीक्षणः इसी प्रकार दूसरा गड्‌ढा खोदें। यह गड्‌ढा भी २ फुट चौड ा, २ फुट लंबा और २ फुट गहरा हो। गड्‌ढे को ऊपर तक पानी से भर दें। जमीन को पानी सोखने में यदि एक घंटे से अधिक समय लगता है, तो वह भूमि अनुकूल है। वहीं पानी सोखने के बाद अगर गड्‌ढे में दरारें दिखाई देती हैं, तो ऐसी भूमि शुभ नहीं होती। यह विधि आज भी अधिकांश वास्तुशास्त्री भवन निर्माण से पूर्व मिट्‌टी के परीक्षण के लिए अपनाते हैं।