Vastu Tips

बिना तोड-फोड करें वास्‍तु समाधान

इसमें दो राय नहीं कि वास्‍तु पर लोगों का विश्‍वास बढ रहा है। घर हो, दफ्तर या मल्‍टी स्‍टोरी बिल्डिंग्‍स, ऑर्किटेक्‍ट और इंटीरियर डेकोरेटर की तरह वास्‍तु विशेषज्ञ के बजट को भी लोग अपने कंस्‍ट्रक्‍शन बजट में शामिल करने लगे हैं। बेशक यह निर्णय समझदारी पूर्ण है कि निर्माण के समय ही वास्‍तु विशेषज्ञ की राय ले ली जाए। मुसीबत तब उत्‍पन्‍न होती है जब हमें पता लगता है कि हमारे पूर्व निर्मित भवन में कोई गंभीर वास्‍तु दोष है। आनन-फानन में हम किसी परिचित या नौसिखिया वास्‍तु विशेषज्ञ से मशवरा कर डालते हैं और वह हमें भवन में तोड-फोड कर वास्‍तु दुरूस्‍त करने का परामर्श दे डालता है। भवन में तोड-फोड करना और पुन: निर्माण करना कोई हंसी-खेल तो है नहीं। फिर हमारा मानना है कि जब रोग का निदान दवाओं के जरिए हो सकता है तो भला ऑपरेशन करने की क्‍या आवश्‍यकता। हां, तोड-फोड के परामर्श लोगों का वास्‍तु से मोह अवश्‍य भंग कर देते हैं। आपको बता दें कि वास्‍तु तोड-फोड का शास्‍त्र कतई नहीं है। अगर आप भी ऐसा मानते आए हैं, तो अपनी यह भ्रान्ति तोड दीजिए। वास्‍तु शास्‍त्र में ऐसे कई प्रभावशाली उपाय एवं गजैट्स हैं, जिनके इस्‍तेमाल से किसी स्‍थान विशेष या स्थिति विशेष की वजह से बनने वाले वास्‍तु दोष का प्रभाव समाप्‍त या कमजोर हो जाता है। आइए जानते हैं, ऐसे कुछ वास्‍तु गैजेट्स के बारे में जिनकी सहायता से बिना तोड-फोड वास्‍तु दोष निवारण किया जा सकता है। पौधे- वास्‍तु शास्‍त्र में पौधों का विशेष महत्‍व है। खासकर तुलसी, बैम्‍बू ट्री, मनी प्‍लांट आदि। कुशल वास्‍तुशास्‍त्री कई प्रकार के वास्‍तु दोष निवारण केवल पौधों के माध्‍यम से करते हैं। उदाहरणार्थ अगर सीढियां ठीक प्रवेश द्वार के सामने बनी हों, तो वहां ऐसे पौंधों के गमले लगाकर वास्‍तु दोष निवारण किया जा सकता है। ऐसे ही कई और वास्‍तु दोषों का निवारण भी पौधों के माध्‍यम से संभव है। शीशे- शीशे यानी मिरर का वास्‍तु से गहरा संबंध है। कनवेक्‍स मिरर या फेंग्‍शुई पा-क्‍वा मिरर ऐसे चमत्‍काकरी गैजेट हैं, जिनकी सहायता से कई गंभीर वास्‍तु दोषों को दूर किया जा सकता है। किसी स्‍थान से नकारात्‍मक ऊर्जा के विस्‍थापन हेतु भी […]

उत्‍तर-पूर्व

किसी ने कहा है कि अगर वर्तमान का सदुपयोग कर लिया जाए तो भविष्‍य अपने आप सुखद हो जाएगा। युवा पीढी भी इसी वर्तमान की परिचायक है। भविष्‍य के सुखद और संपन्‍न होने के लिए युवा पीढी का स्‍वस्‍थ और सुकुशल होना जरूरी है। लेकिन ऐसा नहीं है। आजकल अधिकांश युवा अपनी बेलगाम महत्‍वाकांक्षाओं के चलते या तो डिप्रेशन के शिकार हैं या फिर अग्रेशन यानी आक्रामकता के। इसे भले ही हम युवा पीढी की नादानी या नासमझी कहकर नजरअंदाज कर दें, लेकिन वास्‍तव में यह एक मानसिक विकृति है, जिसके चलते न सिर्फ युवा संगीन अपराध कर बैठते हैं, बल्कि आत्‍महत्‍या की ओर भी अग्रसर होते हैं। आपको बता दें कि इस मानसिक स्थिति की एक बडी वजह वास्‍तु दोष भी है। अगर आपके घर का उत्‍तर-पूर्व यानी नॉर्थ-ईस्‍ट दोषपूर्ण तो आपके परिवार के युवा सदस्‍य इससे दुष्‍प्रभावित हो सकते हैं। आइए जानते हैं कि नॉर्थ-ईस्‍ट में किन दोषों से बचे रहकर हम अपने परिवार के युवा सदस्‍य की मानसिक सेहत का खयाल रख सकते हैं। नॉर्थ-ईस्‍ट यानी उत्‍तर-पूर्व को ईशान कोण भी कहा जाता है। ध्‍यान दें कि आपके घर का नॉर्थ-ईस्‍ट भाग कहीं कटा हुआ तो नहीं है। अगर ऐसा है तो यह निश्चित रूप से एक वास्‍तु दोष है, जिसका सीधा असर युवा सदस्‍यों की मानसिक क्षमता पर पडता है। वे डिप्रेशन या आत्‍मविश्‍वास की कमी और अवसाद की समस्‍या से घिर सकते हैं। नॉर्थ-ईस्‍ट का कटा होना जितना दोषपूर्ण है, इसके फर्श यानी धरातल का घर के अन्‍य भाग से ऊंचा होना भी उतना ही दोषपूर्ण है। कोशिश करें कि फर्श का लैवल घर के अन्‍य भाग की तुलना में नॉर्थ-ईस्‍ट में थोडा नीचा रखें। उत्‍तर-पूर्व यानी नॉर्थ-ईस्‍ट में टॉयलेट होना बीमारियों को आमंत्रित करता है। ऐसे भवन में युवा सदस्‍य तमाम तरह की शारीरिक व मानसिक बीमारियों से ग्रस्‍त पाए जा सकते हैं। ईशान कोण में बने टॉयलेट के साथ अगर युवाओं के निजी कक्ष या स्‍टडी अथवा कार्य करने के स्‍थल में भी वास्‍तु दोष है, तो बीमारी गंभीर रूप भी ले सकती है। ईशान में सीढियां नहीं होनी चाहिएं। वास्‍तु के नियमानुसार ईशान कोण को हल्‍का, प्रकाशवान होना चाहिए। ईशान को ईश्‍वर […]

वास्‍तु से बना अंडरवाटर टैंक लाता है समृद्धि

लिविंग रूम, बेडरूम, बॉलकनी और डाइनिंग रूम आदि की तरह भवन में जल स्रोत का भी विशेष महत्‍व होता है। जल संग्रह के लिए ओवरहेड वाटर टैंक अथवा अंडर वाटर टैंक का निर्माण किया जाता है। वाटर टैंक का निर्माण किस दिशा में किया जाए, इसका ज्ञान होना अत्‍यंत आवश्‍यक है। वास्‍तु के अनुरूप अंटरवाटर टैंक कहां होना चाहिए, आइए जानते हैं। जल स्रोत के लिए चाहे आप बोरवैल का निर्माण करें, कुएं का अथवा किसी अन्य रूप में भूमिगत जलाशय का,इस कार्य हेतु सबसे उचित दिशा उत्तर-पूर्व है। उत्तर-पूर्व में जलाश्य का निर्माण करने से गृह स्वामियों को समृद्धि मिलती है। उत्तर-पूर्वी भाग अन्य दिशाओं की अपेक्षा हल्का माना गया है। वास्तु कहता है कि इस भाग को खुला एवं हवादार रखना चाहिए। इस दृष्टिाकोण से भी उत्तर-पूर्व में भूमिगत जलाशय का निर्माण उचित है। इसका वैज्ञानिक आधार भी है। सुबह के सूर्य की किरणें जलाशय में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को समाप्त कर देती हैं। अगर उत्तर-पूर्वी भाग में जलाशय बनाना संभव न हो तो इसे भूखंड के उत्तर या पूर्वी भाग में बनाया जा सकता है। परंतु इसे दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पश्चिम भाग में नहीं बनाना चाहिए। दक्षिणी भाग में भूमिगत जलाशय होना घर की स्त्रियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वहीं पश्चिमी भाग में होने से परिवार के पुरुष सदस्यों का स्वास्थ्य खराब रहेगा एवं आर्थिक संकट उत्पन्न होगा। दक्षिण-पूर्व या दक्षिण-पद्गिचम में होने से महिलाओं को स्वास्थ्य, मान-सम्मान या अन्य किसी प्रकार की हानि हो सकती है। यही नहीं, इससे पुरुष सदस्यों को जानलेवा बीमारी तक हो सकती है। दक्षिण व दक्षिण-पश्चिम एवं उत्तर-पश्चिम में दीवारों का निर्माण संध्या के सूर्य की किरणों को घर में पड़ने से रोकने के लिए किया जाता है। अगर इनमें से किसी भाग में बोरवैल अथवा कुआं बनाया जाता है, तो वहां उसके रख-रखाव व मरम्मत के लिए बहुत ही कम स्थान शेष रह जाता है। इस व्यवहारिक दृष्टिाकेण से भी उक्त स्थानों पर जलाशय निर्माण उचित नहीं माना जाता। भूखंड के एकदम मध्य में जलाशय निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे वास्तु-विन्यास के आधार पर भवन की संरचना करना दुषकर कार्य होता है। इसके लिए विशाल […]

टॉयलेट के लिए वास्तुच टिप्स

अमूमन देखने में आता है कि लोग टॉयलेट बनाने में असावधानी बरतते हैं या फिर भवन के बाकी हिस्‍सों की तरह टॉयलेट के निर्माण पर उतना ध्‍यान नहीं देते। ऐसा नहीं होना चाहिए। गलत दिशा में या गलत तरीके से बना टॉयलेट परिवार के लिए दुर्भाग्‍य का कारण बन जाता है। हालांकि वास्‍तु में इसके लिए उपाय हैं, लेकिन बेहतर यही है कि निर्माण के दौरान ही टॉयलेट की सही स्थिति का ध्‍यान रखा जाए। आइए, जानते हैं टॉयलेट की सही स्थिति के बारे में। टॉयलेट घर के उतरपश्चिम में बनाना चाहिए। इसे भूलकर भी घर के मध्‍य भाग में या उत्‍तरपूर्व में नहीं बनाना चाहिए। अगर टॉयलेट बेडरूम के साथ अटेच्‍ड बनाना हो तो इसे भी कमरे के उत्‍तरपश्चिम में बनाएं। उत्‍तरपश्चिम में अगर टॉयलेट बनाना संभव न हो तो इसे दक्षिण‍पूर्व में बना सकते हैं। उत्‍तरपूर्व दिशा कुबेर अर्थात धन की दिशा है। इस दिशा में बना टॉयलेट घर में आर्थिक हानि, तंगी लेकर आता है। इसका सीधा असर घर के मुखिया की समृद्धि और यश पर पडता है। इस स्थिति के कारण उसे अपयश का सामना करना पड सकता है। दक्षिणपश्चिम में बना टॉयलेट परिवार के सदस्‍यों को नुकसान पहुंचाता है, विशेषकर परिवार के मुखिया को। टॉयलेट से संबंधित कुछ और आवश्‍यक दिशा-निर्देश इस प्रकार हैं: टॉयलट सीट पश्चिम से पूर्व की ओर अथवा दक्षिण से उत्‍तर की ओर लगी हो। टॉयलेट में अगर शीशा लगाना हो तो उसे उत्‍तर व पूर्व की दीवार पर लगाया जा सकता है। दरवाजा पूर्व अथवा उत्‍तर-पूर्व में होना चाहिए। टॉयलेट में बडी खिडकी उत्‍तर में जबकि छोटी पश्चिम में लगानी चाहिए। टॅायलेट की दीवारों पर हल्‍के रंगों को प्रयोग करें। जहां तक संभव हो काले व लाल रंग का प्रयोग नहीं करना चाहिए।